Home » India » हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल ‘पराजय सूचक’!

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अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में शिरकत करने आये विदेशी विद्वानों का मानना है कि हिन्दी के साथ अंग्रेजी का इस्तेमाल पराजय सूचक है और इसे रोकना बेहद जरूरी है.
आठवें अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में शिरकत करने ब्रिटेन से आये डॉ. नरेश भारतीय ने कहा कि हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल पराजय सूचक है, जिसे रोकना चाहिए और दोनों भाषाओं को अलग-अलग रखना बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि भारतीय धन कमाने के लिए अंग्रजी की ओर जा रहे हैं. विश्व स्तर पर हिन्दी को स्थापित करने के लिए संकल्पित रूप से कार्य किया जाना चाहिए.
जर्मनी के हैम्बर्ग विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापक प्रो. तात्याना ओरस्काइया ने कहा कि जर्मनी में हिन्दी के प्रति लोगों में रुझान भारतीय संस्कृति को जानने के बढ़ा है. उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि भारत से जाने वाले मंत्री एवं अन्य राजनीतिज्ञ अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करते है, जो उपनिवेशकाल की भाषा है. हिन्दुस्तानियों को अपनी राष्ट्रीय भाषा के प्रति प्रेम विकसित करना चाहिए.
इस्राइल के तेलअबीब विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक प्रो. गेनादी श्लोम्पेर ने कहा कि यदि हिन्दी साहित्य की किताबों को छोड़ दिया जाये, तो हिन्दी में उपलब्ध अधिकतर किताबें अनुवाद की हुई होती हैं, जिसके कारण यह अनुवाद की भाषा बन गयी है. हिन्दी को व्यवसाय की भाषा बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी में मूल रूप से काम किया जाना चाहिए और हिन्दी को बाजार की भाषा के रूप में मान्यता दिलाये बिना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका बेहतर तरीके से प्रचार काफी मुश्किल काम होगा.
रूसी निवासी 20 सदी के हिन्दी साहित्य विषय पर डॉक्टरेट कर रही तात्याना दुव्यांस्काया ने बताया कि भारतीय संस्कृति के प्रति विदेशियों की दिलचस्पी न उन्हें हिन्दी के प्रति आकर्षित  किया है. उन्होंने बताया कि पिछले 10-15 साल में रूस में आये परिवर्तनों के कारण अधिक छात्र हिन्दी की तरफ आकर्षित नहीं होते हैं और रूस में भारतीय बाजार उपस्थिति न के बराबर है.

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